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Tuesday, April 26, 2011

इश्क में गैरत -ए -जज़बात ने रोने न दिया- सुदर्शन फाकिर

सुदर्शन  फाकिर  साहिब बहुत ज़हीन  शायर रहे है ! उन की ग़ज़लों में कमाल की  गहरायी रहती है! पेश है उन की लिखी यह ग़ज़ल जो मुझे बेहद  पसंद है! आप इस ग़ज़ल के एक एक शेयर पर गौर ज़रूर फरमाए -


इश्क  में  गैरत -ए -जज़बात  ने रोने  न  दिया!
वर्ना  क्या  बात  थी  किस  बात  ने  रोने  न  दिया !!


आप  कहते  थे  के  रोने  से  न  बदलेंगे  नसीब,
उम्र  भर  आप  की  इस  बात  ने  रोने  न  दिया !!


रोने वालों से  कह  दो  उनका  भी  रोना  रोलें,
जिनको  मजबूरी -ए -हालात  ने  रोने  न  दिया !!


तुझसे  मिलकर  हमें रोना  था  बहुत  रोना  था ,
तंगी -ए -वक़्त -ए -मुलाक़ात  ने  रोने  न  दिया !!


एक  दो  रोज़  का  सदमा  हो  तो रोलें 'फाकिर'  
हम को हर  रोज़  के  सदमात ने  रोने  न  दिया !!

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