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Wednesday, March 30, 2016

बिरहा गीत

 

सांवरे तोहे मन बिसरा ना पाये!

हर पल मोहे तोरी याद सताए!


तड़प बिलख मोरी अँखियाँ बरसे,

दिन रैन तेरे दर्श को तरसे,

तुम बिन कछु भी ना सुहाए!


मन की लगी को कौन बुझाए

अब बिगडी को कौन बनाये,

मोरी अँखियाँ बह बह जाये !


पेड़, पौदे  सब तो वही है,

तेरा बिना कछु लागे न सही है,

कछु ना मोरे मन को भाये !

 

कारी अंखियों में कजरा लगा के,

राह तकूँ तोरी  दीया जला के,

याद इतना भी कोई ना आये!

 

जब से हुए तुम दूर सांवरे , 

नैना हुए तेरे दर्श को बाँवरे ,

सोच सोच मोरा मन घबराये !

Tuesday, March 1, 2016

यादें


घर जाते लगता है मेरा बचपन बुला रहा है !!
भूली यादों का तूफ़ान सा दिल में समा रहा है !!

रेल की खिड़की पर बैठ सदा महसूस हुआ है;
जो जितना क़रीब था वो उतना दूर जा रहा है !!

माँ, बहिन, भाई, संग के खेले सभी साथी,
जैसे कोई चलचित्र सा ज़ेहन पर छा रहा है !!

क्या हो गया हमें, किस दौर से गुज़र रहे हैं?
अपने से हो गुमशुदा, मन भटका जा रहा है !!

बेतरतीब ख्यालों की रफ़्तार कम नहीं होती,
यादों का काफिला बस गुज़रता ही जा रहा है !!

अपनों से बिछड़े पल, सालों में बदल गए है,
वक़्त का गुबार यादों पे बिखरा जा रहा है !!

हंसने को तो यह मन करता हैं बहुत "आशु"
बस यादों का सिलसिला मुझ को रुला रहा हैं !!

Monday, February 15, 2016

ज़रूरी है !


साथ होने पर भी, फांसला होना ज़रूरी है !

दो लोगों में जन्नत- ऐ- हवा होना ज़रूरी है !!


मुहब्बत का मतलब नहीं है बाँध के रखना,

दो रूहों के दरम्यान किनारा होना ज़रूरी है !!


एक दुसरे से मिल कर खाओ खूब प्यार में,

फिर भी अलग से निवाला होना ज़रूरी है !!


प्यार सिर्फ प्यार तक ही सीमत नहीं होता,

दोस्ती को निभाने का भी होना ज़रूरी है !!


कोई भी रिश्ता, फूलों की सेज नहीं होता,

कुछ सहना, कुछ झुकना होना ज़रूरी है !!

 

कोई फर्क प्यार से बड़ा हो नहीं सकता ,

रिश्तों में प्यार निभाने का होना ज़रूरी है!!

 

सच्चा रूह का साथी तो वही होता है "आशु " 

जिस में मुसीबत में साथ देने का होना ज़रूरी है   !!

Tuesday, March 3, 2015

संदेश बिरहन का..






ओ पंछी! यह संदेशवा दे दो जब गुजरो पी की नगरिया।
मोहे पी की याद सताए, मोरी छलक जाए है गगरिया।

वोह कहते थे के आयेंगे अब के सावन में।
एक अगन लगती जाए मोरे तन बदन में।
लगन में उनकी मीठा सा दरद है मन में।

धड़क जाए जियरा मोरा जब चमके वैरी बिजुरिया।
ओ पंछी ...........................................................

नैनन में मोरे अन्सुयन की धारा है बह रही।
बिरहा में उनकी तड़प तड़प कर मैं हूँ मर रही।
आँखें थक गयी राह तक तक आए न वोह अभी।

झनक झनक झन झनक झनक झन मोरी छनक जाए पायलिया
ओ पंछी..............................................................

सूर्य असत हो जब भी संध्या ढलती है।
दिल में उनकी याद रह रह के पलती है।
उन बिन जीवन सूना लागे तन्हाई डसती है।

क्या कहूं तुम्हे ओ पंछी? क्या बीते बिन सांवरिया?
ओ पंछी .................................................................

Friday, January 31, 2014

ग़ज़ल - भूल जाता हूँ..



तुम्हारी याद को दिल से भुलाना भूल जाता हूँ!
आदतन अपने  हालात बताना भूल जाता हूँ!!

मिलती हो तो चाहता हूँ करूँ मैं बहुत सी बातें,
तुम्हारी आँखों में खो कर सुनाना भूल जाता हूँ!

तुम्हारी खिलखिलाती हंसी में अक्सर खो कर,
मैं सारी दुनिया सारा जमाना भूल जाता हूँ!

नहीं वाकिफ हूँ मुहब्बत के रस्मों और रिवाज़ो से 
अपने पागल दिल को मैं समझाना भूल जाता हूँ!

क्या राज-ऐ-उल्फत है मुहब्बत करने वालों का,
मैं नादान समझना यह अफसाना भूल जाता हूँ !

#HindiPride

Monday, December 5, 2011

ख्यालों में

ख्यालों में डूब कर तेरा, चेहरा दिखाई देता है!
गमों से सुखी रेत सा, सहरा दिखाई  देता है !!

तुम को भुलाने की हम ने की हजारों कोशीशें ,
दिल के हर कोने पे तेरा, पहरा दिखाई देता है!!

बदनाम तेरे प्यार में हम हो चुके ओ बेरहम ,
जिंदगी बहता पानी है पर, ठहरा दिखाई देता है!!

हर हसीन चेहरे से  हमें आती है तेरी ही झलक,
जुल्फों से तेरे गैंसुओं का, लहरा दिखाई देता है!!

तुम किस दुनिया में खो कर भूल गए हो हमे,
मुझे अपना हर ज़ख़्म अब, गहरा दिखाई देता है!!

'आशु' हमें दुनिया दीवाना,  कहती है कहती रहे, 
नहीं सुन सकता ये दिल,  बहरा दिखाई देता है!!

#HindiPride

Monday, November 28, 2011

माँ



तुम नहीं हो बताओ अब कौन से घर जाऊं मैं!!
मन करता है बस जिंदा रह कर मर जाऊं मैं!!

तुम्हारे जाने के बाद सब सूना सा लगता है,
बात करने को नहीं, मन है चुप कर जाऊं मैं!!

सबसे बातें मुलाकातें, बस बेगानी सी लगती है,
तुमे मिलने का मन हो, कौन से घर जाऊं मैं!!

कभी कभी हर चेहरा माँ तेरे जैसा लगता हैं ,
अब तुम्हे ढूंढने को कहाँ और किधर जाऊं मैं!!

क्यों इतनी अनजान,  और निर्मोही हो गई माँ,
तेरी यादों का दीया किस तरह बुझा पाऊँ मैं!!
 
अब तो बस एक ही मेरी इच्छा है पूरी कर देना,
अगले जन्म मैं तेरा ही बेटा आ कर बन जाऊं मैं!

Friday, November 18, 2011

अब !!


अब खुद से बात कर के घबरा जाते है हम!
दिल की बात दिल से न कह पाते है हम!!

तन्हाईयों के जंगल में खो कर अक्सर,
अपनी ही परछाई से डर जाते है हम !!

तेरे जैसा कोई नहीं हैं साथी या संगी मेरा,
जिंदगी की राहों में बस कसमसाते है हम !!

या खुदा यह इश्क का कैसा है इम्तिहा,
अकेले में जुदाई की ठोकरें खाते है हम !!

ऐ काश हमें पुकार लो इक बार तुम,
तेरी कसम सब छोड़ के चले आते है हम !!

'आशु' ख़ुशी में भी रोने का ही मन करता है,
तेरी याद में इस दिल को तडपाते है हम !!

Monday, November 14, 2011

कशमकश

कुछ लोग अक्सर मिल कर बिछड़ जाते है!
कुछ रिश्ते बनते तो है, मगर बिगड़ जाते  है!!

जब मिलते है वो रातों की नींदें उड़ा देते है,
जब बिछड़ने है तो अक्सर घर उजड़ जाते है !!

पास रहते है तो हमे अपना सा बना लेते है,
जुदा होते है तो दिल के चैन भी उड़ जाते है!!

शायद कभी वो जिंदगी में फिर कभी ना आयें,
अकेले में  यादों के समन्दर उमड जाते है !!
 
कितना होता है दर्द,  प्यार की कशमकश में,
खुशकिस्मत है वो जो इस इश्क में पड़ जाते है!!

Monday, July 18, 2011

कोई बात नहीं....

वो हमारे नहीं तो ना सही हमें कोई ग़म नहीं!
हम तो सदा उन के रहेंगे यह कुछ कम नहीं!!

वो वादा भूल जाएँ 
हमें कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता,
तुम्हारी याद कोई मिटा दे किसी में दम नहीं!!


बेशक रोती है आँखें, दिल भी मायूस रहता है,
लेकिन तुम हमे चाहते हो ऐसा भी भरम नहीं!!


तुम बहुत बदल गये हो पहले जैसे नही रहे,

हम भी जो हुआ करते थे अब वैसे हम नहीं!!

लोगो के तंज़ सुनने की आदत सी हो गयी है

जख्म जिस से मेरे भर जाएँ ऐसी  मरहम नहीं!!

तेरा ख्याल क्यों दिल से जाता नहीं है 'आशु'

समझाया इस पागल को पर इसे शर्म नहीं!!

Friday, May 27, 2011

तुम्हारे आने से.....



तुम्हारे आने से पहले तुम्हारी खुशबू  हमे आ जाती है!
तुम्हारे कदमो की आहट से हमारी आँखे मुस्करा जाती है!!

तुम्हारे छू लेने से, जिस्म में होती है इक सरसराहट ,

तुम्हारी इक नज़र से रूह जैसे , जन्नत को पा जाती है !!

बिन कहे बिन बोले, दूर हो जायेंगे शिकवे और गिले,

तेरे मिलने की चाहत से हमारी दुनिया पगला जाती है!!

तुम बांहों में लेते हो, लगता है खुदाई ही पा ली हो,
 
तेरे आगोश में आने से हमे सब खुशियाँ भा जाती है!!

हमारी दुनिया में तेरा आना,  खुदा को पाने सा ही होगा 
जैसे हर मांगी दुआ अपना इक असर दिखला जाती है!!

हम किस हालात में होंगे ज़िक्र करना है बहुत मुश्किल,

शायद लगे जैसे नैया भंवर से फिर किनारा पा जाती है !!

Monday, May 23, 2011

आ जाओ !

बेसाख्ता मेरी जिंदगी में इक दिन फिर से आ जाओ !
मेरी सांसों, मेरी धडकनों, मेरे दिल में समा जाओ!!

अब तक तडपते रहे है तेरे ही इंतज़ार में ओ जानम,
आ जाओ, आ कर मेरी दुनिया को  महका जाओ!!

न कभी तुम नाम भी लेना, मुझे फिर छोड़ जाने का,

न सताओ चले भी आओ मेरी जिंदगी में छा जाओ!!

किसी की नहीं है चाहत,  बस इक तेरी ही कमी है,

मेरे इस पागल मन को अपनी हँसी से सहला जाओ!!

खुशियाँ मिल जाएँगी जहाँ भर की जब तुम यहाँ होंगे,

चंचल आँखों के छलकते जाम मुझे फिर से पिला जाओ!!

डर लगता है मुझे दुनिया की झूठी चमक-ओ-दमक से,

मेरे आस्तित्व पे अपनी गहरी जुल्फों को बिखरा जाओ!!

Tuesday, May 17, 2011

मुकरियाँ - अमीर खुसरो



   अमीर खुसरो 

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥
यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥

नंगे पाँव फिरन नहिं देत। पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत॥
पाँव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥

वह आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय॥
मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

जब माँगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥
मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा॥

बेर-बेर सोवतहिं जगावे। ना जागूँ तो काटे खावे॥
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की। ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी॥

अति सुरंग है रंग रंगीले। है गुणवंत बहुत चटकीलो॥
राम भजन बिन कभी न सोता। क्यों सखि साजन? ना सखि तोता॥

अर्ध निशा वह आया भौन। सुंदरता बरने कवि कौन॥
निरखत ही मन भयो अनंद। क्यों सखि साजन? ना सखि चंद॥

शोभा सदा बढ़ावन हारा। आँखिन से छिन होत न न्यारा॥
आठ पहर मेरो मनरंजन। क्यों सखि साजन? ना सखि अंजन॥

जीवन सब जग जासों कहै। वा बिनु नेक न धीरज रहै॥
हरै छिनक में हिय की पीर। क्यों सखि साजन? ना सखि नीर॥

बिन आये सबहीं सुख भूले। आये ते अँग-अँग सब फूले॥
सीरी भई लगावत छाती। क्यों सखि साजन? ना सखि पाति॥

Friday, May 13, 2011

आ जाओ लौट के बाँहों में....



आ जाओ लौट के बाँहों में !
चले आओ चली हुई राहों में!

बीते दिनों को दिल,
फिर से याद करता है,
तुम से मिलना हो जल्दी,
बस यही फरियाद करता है,
किस सोच में डूबे हो तुम,
आ जाओ प्यार की पनाहों में!
आ जाओ ..................

जब भी कभी मेरे कदम,
बीती राहों पर लौट जाते है,
हमारे प्यार के लम्हों की,
मुझे फिर से याद दिलाते है,
तुम्हारे होने का एहसास,
होता है इन सब की निगाहों में!
आ जाओ .................

यह शाखों से टूटे हुए फूल
यह गिर कर मुरझाये पत्ते,
यह सब गवाह है हमारे
तुम्हारे प्यार की दास्ताँ के,
दिल टूट गया तुम भूल गए,
कुछ असर नहीं है आँहों में! 
आ जाओ .................

तेरी ख्वाइश-ए-दीदार में
मैंने सब कुछ गँवा दिया,
तेरे तसव्वुर, तेरी चाहत में,
अपना घर तक भी जला दिया,
तुम क्या जानो हमने क्या पाया
क्या खोया  इश्क की राहों में!
आ जाओ .................

Wednesday, May 4, 2011

नन्द गाँव में कान्हा के प्रेम में गोपी की गुहार ...




लो मरोरो मोरी बैंया मोरे कन्हैया मैं तो तेरी दासी रे!
तुम्ही तो मेरे प्रीतम हों, और मैं तो तेरे ही रंग राची रे!

तोरी छबी बसी मोरे मन आँगन, प्यारे भोले सांवरिया,
तुम्हे देखूँ तो कछु सूजे नाही, मैं तो हों जाऊं बाँवरिया,
मत तरसा अब तो आ कान्हा, मैं तोरे दरस की प्यासी रे !
तुम्ही तो मेरे प्रीतम हों....

सुध बुध मैं अपनी भूल जाऊं, सुन तोरी बंसी की तान रे,
तुम क्यों निष्ठुर हों गए कान्हा, मोरी हालत से अनजान रे,
रिम झिम बरसे मोरे नैनवा, जैसे हों कोई नदिया सी रे!
तुम्ही तो मेरे प्रीतम हों.....

माखन के मटके भरे है लटके, तुम माखन क्यों नहीं खाते,
अपने ग्वाल बाल के संग, तुम मेरे घर पर क्यों नहीं आते,
कान्हा तेरे दरस की लालसा मुझे रहती है तरसाती रे!
तुम्ही तो मेरे प्रीतम हों..

Tuesday, April 26, 2011

इश्क में गैरत -ए -जज़बात ने रोने न दिया- सुदर्शन फाकिर

सुदर्शन  फाकिर  साहिब बहुत ज़हीन  शायर रहे है ! उन की ग़ज़लों में कमाल की  गहरायी रहती है! पेश है उन की लिखी यह ग़ज़ल जो मुझे बेहद  पसंद है! आप इस ग़ज़ल के एक एक शेयर पर गौर ज़रूर फरमाए -


इश्क  में  गैरत -ए -जज़बात  ने रोने  न  दिया!
वर्ना  क्या  बात  थी  किस  बात  ने  रोने  न  दिया !!


आप  कहते  थे  के  रोने  से  न  बदलेंगे  नसीब,
उम्र  भर  आप  की  इस  बात  ने  रोने  न  दिया !!


रोने वालों से  कह  दो  उनका  भी  रोना  रोलें,
जिनको  मजबूरी -ए -हालात  ने  रोने  न  दिया !!


तुझसे  मिलकर  हमें रोना  था  बहुत  रोना  था ,
तंगी -ए -वक़्त -ए -मुलाक़ात  ने  रोने  न  दिया !!


एक  दो  रोज़  का  सदमा  हो  तो रोलें 'फाकिर'  
हम को हर  रोज़  के  सदमात ने  रोने  न  दिया !!

Tuesday, April 12, 2011

तेरी नाराज़गी.....

झुकी नजरों को उठा कर जरा इक बार देखो!
मेरी आँखों में नज़र आएगा असीम प्यार देखो!!

ऐसी नाराज़गी क्या तुम बात क्यों नहीं करते,
तुम्हारी चुपी से डर लगता है मेरे यार देखो !!

तुम्हारा साथ है जैसे साथ हो  खिलते फूलों  का, 
थमा दो हाथ आ जाएगी इक नई बहार देखो !!

तुम्हे चुप देख कर दिल पर हजारों तीर चलते है,
तुम मुस्करा दो हम हो जायें तुझ पर कुर्बान देखो!

शिकायत कर के तो देखो मैं सब कुछ सुन लूँगा,
तुम्हारी कसम, उफ़ न करूंगा मेरे दिलदार देखो!!

तुम नाराज़ हो तो लगता है सारा जहान हो खफ़ा,
अब छोडो जिद, हंस दो मिले दिल को करार देखो!!

Wednesday, April 6, 2011

क्या हुआ..?

मेरे मन यह  बता तुझे क्या हुआ..?
क्यों है गमों के समन्दर में डूबा हुआ?

तुम तो सदा से हो मेरे ख्यालों में,
मैं परेशान हूँ बस अपने सवालों से,
दिल पे कैसा गुबार हैं जमा हुआ?
मेरे मन  यह  बता तुझे क्या हुआ..?

तुम हंसती थी तो मन मचलता था,
सपनों की दुनिया में दिल टहलता था,
अब मन क्यों है  यादों से डरा हुआ?
मेरे मन  यह  बता तुझे क्या हुआ..?

तुम्हारे आने से खुशबू सी छा जाती थी,
तुम्हारी बाते मेरे मन को भा जाती थी,
क्यों बीती बातों से दिल है भरा हुआ? 
मेरे मन  यह  बता तुझे क्या हुआ..?

तुम मेरे पास नहीं कहीं बहुत दूर हो,
अपने हालातों से शायद  मजबूर हो,
मैं क्यों हूँ इस कशमकश में फंसा हुआ !
मेरे मन  यह  बता तुझे क्या हुआ..?

Monday, April 4, 2011

उस का ख़त ....

आज उस की  तरफ  से  मेरे ख़त का जवाब आया है!
ऐसे लगता है जैसे फूलों पर फिर से शबाब आया है!!
 
माना कि वह गाफ़िल नहीं  दिल की बेचैनियों से,
उसके चंद हर्फों से खुशियों का इक बहाब आया है!!
  
बढ़ गयी है बेकरारी बेसब्री कैसे और इंतज़ार करें,
दिल की बेताबी को और बढाने का मुकाम आया है!!

तुम्हारे  प्यार की खुशबू बसी है तेरी इन चंद लाइनों में,
मुझे तेरे दिल की धडकनों का इन से एहसास आया है!!

Wednesday, March 9, 2011

अरमान

जिंदगी  छोटी ही सही  पर अरमान  बड़े  होते  है !
इंसान के अंदर उमीदों से भरे उफ्फान बड़े होते है!!

तमन्नायों से छूट के रह पाना होता बड़ा है मुश्किल,
उन के टूटने से जो उभर जाये ऐसे इंसान बड़े होते है!!

तोड़ो न किसी का दिल, ना किसी के जज्बात से खेलो 
मुहब्बत भरे दिल के टूटने के बुरे अंजाम बड़े होते है!!

गुज़र गए जो पल दफ़न कर दो यादों  के समंदर  में,
यह मीठा ज़हर है जिस  से मरने के सामान  बड़े होते है!!
 
टूटे दिल  को टूटा रहने दो,फिर से तोड़ने को मत जोड़ो
टूटे दिल के बार बार जुड़ने के कम आसार बड़े होते है!!

Saturday, March 5, 2011

Amir Khusro

अमीर खुसरो का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा, आज उन्ही की कुछ रचनाये पेश कर रहा हूँ:

ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.

Translation
Khusro! the river of love has a reverse flow
He who floats up will drown (will be lost), and he who drowns will get across.


सेज वो सूनी देख के रोवुँ मैं दिन रैन,
पिया पिया मैं करत हूँ पहरों, पल भर सुख ना चैन.

Translation
Seeing the empty bed I cry night and day
Calling for my beloved all day, not a moment's happiness or rest.


छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
खुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

Translation
You've taken away my looks, my identity, by just a glance.
By making me drink the wine from the distillery of love
You've intoxicated me by just a glance;
My fair, delicate wrists with green bangles in them,
Have been held tightly by you with just a glance.
I give my life to you, Oh my cloth-dyer,
You've dyed me in yourself, by just a glance.
I give my whole life to you Oh, Nijam
You've made me your bride, by just a glance.

Monday, November 15, 2010

तेरी परछाई....

तूं नहीं हैं मगर तेरी परछाई खड़ी है!
बात कुछ नहीं फिर भी बात बड़ी है !!

खामोश सी है यह,  बात भी नहीं करती,
नाराज़ भी है यह , और मुझ से लड़ी है !!

घंटों पहरों मुझ से बातें करती है,
यादें जिंदा रखने की अजीब कड़ी है!!

बहुत ही तेज़ रफ़्तार है जिंदगी की,
यह बीच में बन के इक दीवार खड़ी है !!

प्यार बदलाव नही अधिकार मांगे है
तेरी याद इस दिल में अभी तक गडी है!!

तुम यहाँ नहीं, पर यह तो साथ रही है,
तुम से बढ़ कर तेरी परछाई बड़ी है!!

Friday, November 12, 2010

दबे पांव

 इक दिन तुम हलके से, दबे पांव,
मेरी जिंदगी में फिर से आ जाओ !
मेरी बांहों में, मेरी धडकनों में,
मेरी सांसो में फिर से समा जाओ !!

छोड़ दो दुनिया की सारी रस्मे,
तोड़ दो यह रिश्तों की दीवारें,
आ जाओ अब आ भी जाओ,
फिर से प्यार की कस्में निभा जाओ !!

मेरी जिंदगी की सौगात हों तुम,
मेरे लिए एक कायनात हों तुम,
गुजर जायेगा यह मुश्किल सफर,
अगर तुम मेरी बाहों मे आ जाओ !!

बडी मुश्किल से मिलते हैं दो दिल, 
मिलते है तो मिल जाती है मंजिल ,
आ भी जाओ तुम मेरी जिंदगी में अब,
अपने प्यार की  नदिया बहा जाओ!!

अजीब होती है ग़म-ए-मुहब्बत की रस्मे,
कुछ भी नहीं रहता है इस में अपने बस में,
जो हुआ उसे भुला, चली आओ चली आओ
मेरी दुनिया मेरे  घर को फिर से सजा जाओ !!

Sunday, August 15, 2010

लम्हा.. लम्हा.. लम्हा ..जिंदगी है....



हर लम्हा जो हम जी रहे है..उसे उसे एक एक कर के इकठ्ठा करें तो एक जिंदगी तये हो जाती है. कुछ सुन्दर यादों को समेटे हुए तो कुछ खट्टी मीठी व् कडवी यादों को समेटे हुए.इन बीते लम्हों में हम कितने रिश्ते बना लेते है और कितने अपने हमे छोड़ कर अपनी मंजिल की और चले जाते है.. जैसे गाडी में बैठे सभी को अपने अपने स्टेशन पर उतर जाना होता है..कुछ ऐसे ही वह हम से बिछड़ जाते है.. कितने और सवार लोग जो हमे गाडी में मिलते है वोह अनजाने ही रह जाते हैं क्योंकि हम उन के साथ कुछ अपने लम्हे बिता नहीं पाते जा बिताने का मौका नहीं देते..हम क्यों नहीं प्यार के साथ कुछ पल कुछ लम्हे या कुछ क्षण उन के साथ बिता पाते?

जिंदगी की गाडी दौड़ती जाती है ..चाहे हम उन लम्हों को हंस कर बिता दे जा किसी से नाराज़ हो कर जा कोई बात न कर..इस के लिए कोई शिकवा जा शिकायात किसी से ना कर के अपने ही अन्दर खोजना चाहीये के हम ने वो कीमती लम्हे क्यों जाया किये..?

कुछ ऐसे ही लम्हे थे वो भी ...जिस तरह से तुम मुझे पकड़ कर अपनी पकड़ खोने नहीं देना चाहती थी ..उन लम्हों में तुम्हारी एक नज़र मेरे होंठों पर बरबस ही और बड़ी आसानी से कैसे एक मुस्कान पैदा कर देती थी...अपने आप में खो जाने का इक एहसास सा दिल में जाग उठता था..जंगली तितलियों जैसे दिल में उड़ उड़ कर अपने अन्दर एक एहसास की गर्मी पैदा कर देने वाले वोह लम्हे...तुम्हारे एक कोमल स्पर्श के साथ, दिल की धड़कने जैसे धडकना ही भूल जाती थी...आँखें, सब कुछ भूल कर ..आसपास से दूर कर के किसी एक अनजानी दुनिया के सपनों में ले जाती थी ..उन लम्हों के गुज़र जाने का एहसास अभी भी क्यों बना हुआ है..

कभी तो ऐसे लगता था केवल तुम और मैं ही मेरी दुनिया में मौजूद थे ...सिर्फ तुम और मैं एक साथ ..कितने मायने रखते थे वोह पल ...आज भी..तुम्हारे साथ गुज़रे हुए वो लम्हे जीवन में सब से अनमोल लम्हे है..क्षण हैं..पल है..जिन्हें आज भी दिल में हमेशा के लिए लगाये रहा हूँ...वोह..पल...वोह लम्हे ..जुड़ जुड़ कर एक जिंदगी बन चुके है....यादों में है...बस!!

Monday, February 8, 2010

ब्लोगरो की महफ़िल - भाग २

आप सभी ने मेरी रचना 'ब्लोगरों की महफ़िल' भाग - १ को पढ़ कर मेरा बहुत होंसला बढ़ाया और प्रेरित किया के इस का भाग-२ भी लिखूं . मेरे बहुत से प्रिय और ख़ास ब्लागर साथियों के ब्लॉग के बारे में व उन की रचनायों की कुछ जानकारी देने का मेरा यह एक छोटा सा प्रयास है! प्रस्तुत है ब्लागरों की महफ़िल का भाग-२ और उम्मीद करता हूँ आप को पढने में उतना ही आनंद आएगा जितना मुझे इसे लिखने में आया है !!

महफ़िल अभी है  जमी हुई आप को और साथियों से मिलवाना है!
ज़रा ठहरें और पास बैठे मुझे  उन का तुआरुफ़ अभी करवाना है!!

'संगीता स्वरुप' जी अपने 'बिखरे मोती' चुनने को है लगी हुई,
साहिल के पास 'नए ख़्वाबों' का उन के पास भरपूर खजाना है !!

'महफूज़ अली' 'मेरी रचनाएँ' में अपने सवालों के जवाब मांगते है,
 कौन और कहाँ खो गया है उन का, यह कौन सा रिश्ता पुराना है!!

'मन का पाखी' की 'रशिम रविजा' ने क्या उपन्यास लिख मारा है,
'और वोह चला गया बिना मुड़े' उसे पड़ेगा मुड़ कर फिर से आना  है!!

'कुछ मेरी कलम से' रंजू भाटिया जी कुछ तेज़ रफ़्तार से डरती है,
'आज का सच' लिख फिर भी उन्हें,  हमें हकीकत से मिलवाना है!!

'स्वपनरंजिता' से आशा जोगलेकर जी, मेरे इस देश में ही रहती है,
 'दुनिया तो' में दी हुई सार्थिक्ता की शिख्सा को हमें ज़रूर निभाना है!!

'हेमंत कुमार' 'क्रिएटिव कोना' से बच्चों व बड़ों के बारे में लिखते है,
ठण्ड  के मौसम की ग़ज़ल को उन्हें गोठियों की आग से देह्काना है!!

'अर्श' दिल्ली के फर्श पे बैठे क्या 'नए साल के गुल' खिलाये जाते है,
खिड़की के उड़ते दुप्पटों के ख्याल से क्या सुन्दर मन को बहकाना है!!

'गगन शर्मा' जी कुछ औरों से हट कर बहुत 'अलग सा' लिखते है,
क्या खूब  ताश के चारों रंगों के , बादशाह और बेगम से मिलवाना है!!

'गुलदस्ता-ऐ-शायरी' की बबली जी, क्या खूब चार लाइनों में लिखती है,
उनकी हर रचना व् शेयरों में सदाबहार ख्यालों का सुन्दर सा खजाना है!!

दिल्ली की गृहणी 'वंदना गुप्ता' जी 'ज़ख़्म जो फूलों ने दियें' लिखती है,
क्षणिकाओं के ज़रिये उन्हें अपने प्यार को ज़बरदस्ती से मनवाना है!!

'भीगी ग़ज़ल'  की 'श्रदा जैन' जी सिंघापुर से ग़ज़लों की रचना करती है,
'अजीब शख्श' का किताब मेज़ पे छोड़ पढ़ कर सच दिल को लुटवाना है!!

लिखने को तो बहुत है साथी और भी, पर क्या करें अभी बस मजबूरी है,
आखिर यारो इस ग़ज़ल को मुझे इस के अंजाम तक ज़रूरी पहुचाना है !!

वक़त और किस्मत ने जो साथ दिया तो शायद फिर इस पर लिख पाऊँगा,
कुछ गलती हों तो क्षमा करे, 'आशु' का मकसद सब के औरों से मिलवाना है!!

Wednesday, January 27, 2010

गणतंत्र दिवस पर सभी को बधाई





31.राज्य, 1618 भाषाओं, 6,400 जातियों, 6 जातीय समूह, 29 त्यौहारों,
1 देश, एक भारतीय होने पर गर्व है. ६० वे गणतंत्र दिवस पर सभी को बधाई 

Sunday, January 24, 2010

ब्लागरो की महफ़िल ..

यह रचना लिखने का बड़ा मज़ा आया! मैंने कोशिश की है अपने कुछ जाने पहचाने साथी ब्लागरो के ब्लाग व उनकी कुछ रचनाओं को अपनी इस ग़ज़ल में शामिल करने की! इस ग़ज़ल का मीटर सही रखना कुछ मुश्किल था फिर भी कोशिश की है. उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी!

यारो शामिल हों जाओ हम ब्लागरो की महफ़िल सजाये बैठे है!
आ जाओ खेलो अपनी रचनायों से हम  बिसात बिछाए बैठे है !!

आईये 'समीर जी' 'उड़न तश्तरी' अपनी विल्लज की कतरने ले कर
और हम सब को बताये अपने किस्से जो भाभी जी से छुपाये बैठे है !!

'श्यामल' जी अपनी 'मनोरमा' के कभी हम को भी दर्शन करवाइए,
यह कौन सी 'खुश्बू'है जो आप अपने घर के अन्दर फैलाये बैठे है??

'वाणी' जी अपनी 'ज्ञानवाणी' से हमे कुछ उपदेश ज़रूर सुनाये,
क्यों आप अपनी खिड़की के बाहर , तिरंगा झंडा फेहराए बैठे है!!

'दिगम्बर नासवा' जी आप अपने सपनों की दुनिया में क्यों खोये है,
'गुरु पंकज' की अनुकम्पा से क्या अति सुन्दर ग़ज़लें बनाए बैठे है!!

वाह वाह 'अनिल कान्त'  जी कसम से आप क्या ज़बरदस्त लिखते  है,
हम बेचारे सब  पाठक पढ़ पढ़ कर आँशुयों  की नदिया बहाए बैठे है,

'निर्मला कपिला' जी आप भी क्या खूब 'वीरांचलगाथा' लिखती है,
औरों के दुःख को देख अपना दुःख छोटा मान कर भुलाए बैठे है !!

'शिखा वार्ष्णेय' जी लन्दन से, आप की 'सपंदन' तो अन्तराल छूती है,
'किस की शामत आयी है' ? लिखती  है जैसे आप डंडा उठाये बैठे है !!

मैंने कहा 'पी सिंह' जी आप क्यों 'वक़्त के हाथों तकदीरें' सौंपे हुए है?
आप मैनपुरी से अब ग़ज़लों के लिखने की खूब धाक जमाये बैठे है!!

अब क्या कहूं 'संजय भास्कर' जी की अजीब 'आदत है मुस्कराने' की
'न तूने कुछ कहा' लिख कर दिल के क्या क्या राज़ बताये बैठे  है!!

'खुशदीप सहगल' जी क्या कमाल लिखा आप ने 'देशनामा' में अभी,
इसे पढ़ कर हम अपनी नयी सोच  बनाने का  इरादा बनाये बैठे है!!

Wednesday, January 6, 2010

मंजिल दूर तो है लेकिन

सभी ब्लागरों को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं !!
इस अवसर पर पेश है एक नयी ग़ज़ल, उम्मीद करता हूँ आप सब को ज़रूर पसंद आएगी: 

मंजिल दूर तो है लेकिन, तुम हिम्मत कर के चलो!!
राह मुश्किल हों तो हों, तुम प्यार के रंग भर के चलो!!

जिंदगी तो सुलगती रहती है सदा कशमकश में मगर,
रोज़मर्रा की ज़दोजहद से तुम निकल उभर के चलो!!

कभी समझेगा कोई तेरी उलझनों के तानो-बानो को,
तुम इस ख्याल को अपने ज़ेहन से अलग कर के चलो!!

सुना करते थे  के जिंदगी को जिंदादिली का नाम है,
सो तुम सीना तान के जूझो और हों निडर के चलो !!

ग़मों के अंधेरों में उम्मीदों का दिया जलाये रखना,
भूल के कल की बीती बातें, आज को बना संवर के चलो!!

Friday, January 1, 2010

ग़ज़ल - घर में रहते हुए भी


घर  में  रहते  हुए  भी मुझे बेघर सा क्यों लगता है!
जाने से है चेहरे अनजाना शहर सा क्यों लगता है!!

वोह जगह यहाँ तुम और हम खुश हों के रह सकें,
हकीकत न हों इक ख्वाबी मंज़र सा क्यों लगता है!!

रस्ते वही, पेड़ पौधे  वही, यहाँ मिलते थे हम कभी
फूल तो बिखरे है मगर ये बंज़र सा क्यों लगता है!!

वर्षों ही निकल गए है, कई मौसम भी बदल गए है,
बातें तो मीठी है सुन कर ज़हर सा क्यों लगता है!!

दर किनार सब वही है बस कहीं सकून ही नहीं है,                    
सिर्फ तेरे ना होने से उजड़ा मंज़र सा क्यों लगता है!!

हों सके आ जाओ तुम, लौटा दो ख़ुशी के पल छिन,
बिना तेरे मुझ को जीना इक कहर सा क्यों लगता है!!

आओ हम सब बच्चे बन जाए...




आओ हम सब बच्चे बन जाए!
मन से फिर से सच्चे बन जाए!!

खेल कूद कर मन बहलाए
मन में कोई विषाद न लाये
अपने सब संघी साथी से खेलें
दुःख सुख सब के बाँट के ले लें

हम  न्यारे और अच्छे बन जाए!
आओ हम सब बच्चे बन जाए!!

हिंसा और घृणा से हम दूर रहे
बापू का शांति पाठ हम पूर करें
दुनिया में मिल कर प्यार बढाएं
भारत का विश्व में नाम कमाए

दुश्मन से कभी ना कच्चे बन जाए!
आओ हम सब बच्चे बन जाए!!

हम मन में कभी कोई न द्वेष धरें
कभी किसी से कोई न कलेश करें
सब से मिल कर झूमे और गायें
भारत को खुशियों का देश बनाये

द्वेष भूल कर अच्छे बन जाये! 
आओ हम सब बच्चे बन जाए!

Thursday, December 17, 2009

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो

मैं निदा फाजली साहिब की ग़ज़लों का बहुत शौक़ीन हूँ और बहुत प्रभाभित हूँ उन के सोचने की गहराई से व् उन के अंदाज़-ऐ-बयाँ से व् उन के नजरियों से। उनकी लिखी यह ग़ज़ल मेरे दिल के बहुत अज़ीज़ है इस लिए मैं आप के साथ यह share करना चाहता हूँ । चित्रा सिंह जी आवाज़ ने इस ग़ज़ल को गा कर ओर भी चार चाँद लगा दिए ओर यह ग़ज़ल उन की बहुत ही बेहतरीन गाई हुई चुनिन्दा ग़ज़लों में से एक है। कुछ शेयर उनकी गयी हुई ग़ज़ल में नहीं है।

इसे सुन कर मुझे अपनी जिंदगी का अब तक का भारत से अमेरिका आने का और झूझने के सफ़र का हर लम्हा एक फिल्म की तरह से याद आ जाता है। उम्मीद करता हूँ आप सब को भी यह ग़ज़ल ज़रूर पसंद आएगी: 


सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो ।
सभी हें भीड़ में तुम भी जो निकल सको तो चलो ॥

इधर उधर कई मंजिल हें चल सको तो चलो ।
बने बनाए हें सांचे जो ढल सको तो चलो ॥

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं ,
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो ॥

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता ,
मुझे गिराके अगर तुम संभल सको तो चलो ॥

यही है ज़िन्दगी कुछ ख्वाब, चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो ॥

हर इक सफ़र को ही महाफूस रास्तों की तलाश ,
हिफज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो ॥

कहीं नहीं कोई सूरज , धुंआ धुंआ ही फिजा ,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो ॥

- निदा फाजली


Monday, December 14, 2009

सुबह हो रही है...



सुबह का समय है,
ठंडी बयार चल रही है।
पंछी चहचहा रहे है,
रसीले गीत गा रहे है।
सूरज निकल रहा है,
किरणे फैला रहा है।
चारो तरफ़ जैसे,
इक जादू सा छा रहा है।
मन्दिर में कहीं पुजारी,
घंटी बजा रहा है।
मस्जिद में कहीं मुल्ला,
खुदा को बुला रहा है
गुरद्वारे में सुरीला रागी,
शब्द कीर्तन गा रहा है।
मुर्गा भी गर्दन उठाये,
बांग दे सुबह को बुला रहा है।
बच्चा उठाये बस्ता,
स्कूल की ओर जा रहा है।
किसान बैल ले कर,
खेतों को जा रहा है।
कंधे पर है हल,
सर टोकरा ले जा रहा है।
बैलों के गले में लटका
इक साज बज रहा है।
इन सब नजारों से,
मुझे ऐसा लग रहा है।
जैसे खुदा ज़मीन पर,
ख़ुद आप आ रहा है।

Friday, December 11, 2009

आँखें क्या कहती है?

पहली ही नज़र में प्यार हो जाने की बात तो अक्सर आप ने सुनी ही होगी क्योंकि यह एक मानी हुई सहज और स्वभाविक सी बात है। किसी की आँखों में प्यार देखना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और अध्याम्तिक घटना है जिस की पूरण व्याख्या कोई नहीं कर सका है। आँखे तो एक तरह से आत्मा की खिड़कियाँ होती है जिन के रास्ते कोई भी झाँक कर दुसरे के मन की भावनाओं को पढ़ सकता है। सच्चे मन से मर्म को सपर्श करने वाली निगाहों से देखने वाली आँखों की मन पर सीधी प्रतिक्रिया सी होती है जिसे शारीरक स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। यह भी एक ज़ाहिर सी बात है की आँखों की प्रतिक्रिया से पेट का संतुलन भी बिगड़ जाता है, जैसे घुमावदार सड़क पर यात्रा करते समय मितली का आना, अगर आँखें सिर्फ सीधी सड़क पर ही रहें तो कभी मितली भी नहीं आती। इसलिए आँख द्वारा देखे गए किसी द्रश्य का प्रभाव मानव शरीर पर भी पड़ता है। यहाँ तक की रंग भी हमारी मनोस्थिति को प्रभावित कर सकते है और ऐसी भावात्मक प्रतिक्रियों को जनम देते है जिसे शरीर भी महसूस कर सकता है। आप कहोगे वो कैसे। तो देखिये अगर आप हरे रंग को देखेंगे जो हल्का पीलापन लिए हो तो मन में एक freshness का अहसास पैदा हो जाता है लाल रंग वास्तविक में हार्दिकता या गर्मजोशी की भावना पैदा कर सकता है। हरा रंग एक ठंडापन, गहरा नीला रंग अपशकुन, हल्का नीला रंग मनोरमता की भावना, बैंगनी रंग विषाद व् उदासी की भावना तथा हल्का पीला रंग आनंद और चमकती धूप जैसे ख़ुशी और प्रसन्नता की भावना पैदा कर सकता है

कभी कभी हम यह भी देखते है की प्रतिक्रिया या Reaction अनुकूल दिशा में भी काम कर सकते है और हमारे मनोभाव, हमारी द्रिष्टि को प्रभावित कर सकते है। हम वही देखते है जो देखना चाहते है या फिर जिसे हम देखना नहीं चाहते उसे नजरअन्दाज ही कर देते है। जैसे अगर हमारा मन उदास हो तो हमारी द्रिष्टि सिर्फ उदासीन करने वाली वस्तुयों को ही देखती है प्रसन्नता भरे नज़ारे नज़र अंदाज़ हो जाते है। हमारी सभी छह इन्द्रियों में से द्रिष्टि की इन्द्री सब से महतवपूर्ण है, हमारी सभी ज्ञानिन्द्रियों में से निसंदेह यह सर्वाधिक सवेंदनशील है तभी तो खतरे के वक़्त आँखें फ़ौरन बंद हो जाती है और शरीर के सम्पूरण अंग अपने आप हरकत में जाते है


किसी व्यक्ति की आखों को देख कर पता चल जाता है कि वो किसी चीज़ को देख रहा है, आप ख़ुद भी किसी को खतरे का संकेत करने के लिए आंखों से इशारे का काम लेते है। हमारी नज़र से ही हमारी अपराध-भावना, गर्व- भावना, या अन्य मानवीय भावनाओं का संकेत मिल जाता है। आँखें आनंद और प्रसन्नता तथा दुःख और व्यथा प्रगट करती है। इनके आंसू, दुःख - दर्द, व्यथा और दिल टूटने या फ़िर खुशी और आनंद के प्रतीक हो सकते है। इतना ही नही, हम तो तब तक हँसते रह सकते है जब तक हमारी आंखों से आंसू टपकने लगे।

एक बात बहुत महत्वपूर्ण है वो यह कि जब भी हम पहली बार किसी व्यक्ति से मिलते है तो हमारा पूरा ध्यान दूसरे व्यक्ति की आंखों पर ही होता है क्योंकि आँखें चरित्र का सारा भेद खोल देती हैं। हम चाहे कितने ही मुखोटे लगा ले, कितना ही प्यार प्रदर्शित करे, लेकिन हमारी आँखें हमारी वास्तविक प्रकृति, स्वभाव रवैये को उजागर कर देती है। होठों पर मुस्कान ला कर मित्रता का नाटक तो किया जा सकता है लेकिन आंखों से वास्तविकता प्रगट हो जाती है। अगर वो मुस्करा नही रही हो तो भेद खुल जाता है की उन में मित्रता की चमक है या नही।

आँखें मन के आंतरिक भावों की सब से बड़ी भेदिया है। अक्सर फिल्मों में हीरो हिरोइन से कहते तो सुना होगा की " मेरी आंखों में झांक कर देखो क्या मै ने तुम्हे धोखा दिया है?" चंचल आखों वाले व्यक्ति को तो तुरंत ही अविश्वनीय मान लेना चाहिए। ऐसा व्यक्ति या तो आप से आँखें मिला ही नही पायेगा अथवा उसकी आँखें इधर उधर कुछ इस ढंग से घूमती रहेंगी जैसे छुपने की जगह तलाश कर रही हो।

आँखें सहायता मांगने का संदेश भी भेज सकती है। वे अनुनय भरी निगाहों से देख सकती है, उन की दृष्टि में एक अनुरोध हो सकता है या फ़िर एक ठंडेपन के साथ हमारी नज़रों का वो प्रतिरोध कर सकती हैं, या फ़िर वे पूरी सत्रकता से शंकालु हो उठती है या किसी शंका से सिकुड़ सकती है। कुछ आँखें हम पर उचटती सी निगाह डाल कर पूर्ण तटस्थ और उदासीनता का संकेत दे सकती है। ऐसी आंख्ने भी हो सकती है जो कोई उत्तर पाने के लिए व्यग्र हो, ऐसी आँखें भी हो सकती है जो जिनमे इच्छा, आशा, अभिलाषा और लालसा की चमक हो, या उदासी, प्रान्हीनता, निराशा और दुःख का गहरा अन्धकार हो। आँखें हमारी जुबान के बाद समूचे शरीर का सब से अधिक बोलने वाला अंग है और हमारे मन के सच्चे भावों को वास्तविक रूप में व्यक्त करने के लिए जुबान से भी अधिक विशावाश्नीय है। यहाँ जुबान एक बात कह सकती है वह आँखें कुछ और भी कह सकती है। जुबान तो मिश्री की तरह से मीठी हो सकती है पर आंखों से टपकती घृणा वास्तवकिता प्रगट कर देती है। यह भी हो सकता है की शब्दों में तो गुस्से को वाणी मिल रही हो लेकिन आँखें प्रेम में खाई हुई चोट की खानी कह रही हो। सो आँखें हमारे सभी भावों को स्रवाधिक सच्ची निष्कपट संदेश वाहक यानी Communicator है। बेशक हम चाहे या ना चाहें पर यह मन की गहराईयों में छुपे भावों को उजागर कर देती हो। हमारी जुबान झूठ बोल देती है पर आँखें उस के सम्बन्ध में प्राय सच ही बोलती है सो झूठ पकड़ा जाता है।

आँखें ही वोह अंग है जिन के द्वारा hypnotism सम्भव है। इनमे इतनी शक्ति है की किसी भी व्यक्ति को आज्ञा का पालन करने पर मजबूर किया जा सकता है। आंखों के माधय्म से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं, अभिलाषायों, गतिविधियों और आत्मा को ना केवल प्रभाभित ही कर सकता है बल्कि कंट्रोल भी कर सकता है।

Tuesday, December 8, 2009

कितना मुश्किल लगता है..

बीती बातों को भूल के जीना कितना मुश्किल लगता है,
भंवर के बीच सफीना रखना  कितना मुश्किल लगता है॥

नादाँ दिल भूले भी तो कैसे अपनी बीती यादों को,
दिल से किसी के नाम का मिटना कितना मुश्किल लगता है॥

ग़मज़दा हो दिल तो कैसे खुशीयों को महसूस करे,
अपनी ही तनहाइयों से उभरना कितना मुश्किल लगता है॥

तेरी आँखे, तेरा चेहरा रहता है सदा ख्यालों में,
तेरे वजूद से दूर हो रहना कितना मुश्किल लगता है॥

बीत चुकी है जैसे अब तक बाकी भी गुज़र जाएगी,
रोते रोते फ़िर भी हँसना कितना मुश्किल लगता है॥

उनकी ज़फा से हमने तो घर जला कर रख दिया,
अपनी वफ़ा से जिंदा रहना कितना मुश्किल लगता है॥

आशु क्या करें शिकवा मुहब्बत की रुसवाइयों का,
सब को जग में प्यार का मिलना कितना मुश्किल लगता है॥

Monday, December 7, 2009

सुन बेवफा..

सुन बेवफा यादों को मेरी तुम चाह कर भी भुला ना पाओगी ।
रोंती रहोगी ख्यालों में मेरे, मगर तुम हम को रुला ना पाओगी ॥

इश्क में मेरे तुम डूब मरोगी यादो के अंधेरों में खो जाओगी,
बंद दर जो मैंने अपना कर दिया, तुम उसे खुलवा ना पाओगी॥

तरसोगी मेरे पास आने को, जब तनहाइयों से घबरा जाओगी,
मेरे गम जब में तुम रोओगी , याद आने पे मुस्करा ना पाओगी॥

आएगा एहसास मेरी बातों का, तुम अकेले बैठ कर पछताओगी,
दिल तेरे पे मैंने जो नाम लिखा, चाह कर भी मिटा न पाओगी


आँखों से झरझर बहेंगे आंसू, तेरे दामन को भिगो कर रख देंगे,
चाहोगी भी अगर अपने मन को, तो उस को समझा ना पाओगी


याद आएगा हमारा घंटो बैठ , प्यारी मीठी बातों में खो जाना,
बीते दिनों के हंसी लम्हों को, तुम फिर से बुला न पाओगी

Wednesday, December 2, 2009

चाय वाली दीदी - अन्तिम भाग

" इस कहानी को देरी से पूरी करने के लिए मैं अपने प्रिय पाठको से क्षमाप्रार्थी हूँ। इसे लिखने के लिए मुझे अपने अन्दर से बहुत कुछ खोजना पड़ा और बड़ी तकलीफ भी हुई इसे पूरा करने में इसे लिखते वक़त मुझे कुछ ऐसे हालातों का सामना करना पड़ा जिन के बारे में सोचा नही था। पेश हैं अन्तिम कड़ी, उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी"
- आशु



जब
भी मैं स्कूल से लोटता तो चाय मैं मिस्सी दीदी के यहाँ ही पीता थावोह मुझे बिना दूध वाली चाय नहीं देती थी जब मिस्सी दीदी बिना दूध वाली चाय पीती थी तो पता नहीं क्यों मेरा मन उदास हो जाता था मैंने कई बार उन्हें मना भी किया पर उन से यह आदत छूटती ही थी, वो दिन में कम से कम १०-१२ प्याले चाय पीती थी बीजी ने कई बार मना भी किया मुझे के मैं मिस्सी दीदी के पास जाऊं, और पापा से भी बोला कई बार पापा ने कहा, " अरे बच्चा है क्या हुआ, फिर वोह बेचारी अकेली है अगर वोह दो घडी इस से बात कर लेती है तो क्या फरक पड़ जाता है" जात पात तो पापा पहले से ही नहीं मानते थे हालांकि बीजी काफी सखत थे इस मामले में

लेकिन फिर मैंने जाना आना कम कर दिया क्योंकि लड़के मुझे चिड़ाने लगे थे. मुझे बड़ा गुस्सा भी आता था सो मैं कई कई दिनों बाद सब की नज़रे बचा कर चला जाता था मिस्सी दीदे पूछती, " इतने दिन कहाँ था रे?"

उस के बाद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कुर्सी पर बेठाती फिर चाय पिलाती और केक पास्ट्री भी खाने को देती अब तो जैसे मिस्सी दीदे औरत अधिक हिन्दोस्तानी लगने लगी थी. वोह अक्सर साडी पहनाने लगी थी और फिर साडी के छोर पर कभी कभी चाबियों का गुच्छा बंधा रहता था कभी कभी हाथों पर महावर भी रचती ठी मिस्सी दीदी को महावर रचना मैंने ही शुरू किया था अब जब कभी मिस्सी दीदी को महावर रचाने को कहती तो मैं कह देता, " अब मैं नहीं लगाऊंगा मैं अब बड़ा हो गया हूँ"

"ओह यह बात है! ज़रा मैं भी देखूं कितना बड़ा हो गया है तू " कह कर हँसते हँसते मेरे सामने खडी होती फिर कहती, " ज़रा खड़े हो तो तुम्हे नाप कर देखूं तूं कितना बड़ा हो गया हे रे मुझ से "

फिर मुझे हाथ से नाप कर कहती, " तूं तो अभी तक मेरे कन्धों तक भी नहीं पहुंचा, बड़ा होने चला है "

तभी कुछ दिनों बाद मिस्सी दीदी को अचानक अटैक हो गया वोह बिस्तर पर पड़ गयी. हस्पताल का सारा स्टाफ उसे दिलासा दे कर गया. डाक्टरों ने उसे चाय पीने से भी मना कर दिया मुझे अच्छी तरह से याद है हमारे घर के पिछली तरफ शिव जी भगवान् का मंदिर था मुझे शिव जी भगवान् पर बचपन से ही बड़ी आस्था रही है स्कूल से लोटते समय उस की सीमेंट से बनी बेदी पर माथा टेक कर परनाम करता और कहता था , " हे शिव बाबा भोलेनाथ, अगर आप मुझे अपना साचा भक्त मानते है तो मेरी मिस्सी दीदी को शीघ्र ही ठीक कर दो" फिर कहता था, " हे शिव जी बाबा, मेरी मिस्सी दीदी हिन्दू नहीं है, इस का आप विचार करें क्योंकि मैं तो हिन्दू हूँ और मिस्सी दीदी तो मेरी बहन है. मिस्सी दीदी का यहाँ कोई नहीं सो उसे शांती देना भगवान "

लेकिन जब काफी दिनों से मिस्सी दीदी की तबियत ठीक नहीं हुई तो एक दिन मैंने दीदी के घर लगी जेसुस क्रीस्त की तस्वीर के आगे प्रार्थना की थी, "मिस्सी दीदी को ठीक कर दो ईस्सू। उस का मंगल करना. तुम्हारे देश की लड़की इस देश में मुसीबते झेल रही है प्रभु, उस की रक्षा करो उसे और कोई मुसीबत में मत डालो ।"

फ़िर एक दिन काली माँ के मदिर में पाँच आने का प्रसाद चढ़ा कर मैंने मिस्सी दीदी को प्रसाद ला कर दिया जो मिस्सी दीदी ने बड़ी श्रद्धा से खाया। धीरे धीरे दीदी की तबियत सुधर गयी तो मैंने सब भगवानों का धन्यवाद किया। मिस्सी दीदी के चेहरे पर चिर-परिचत सी मुस्कान फ़िर से लौट आयी।

एक दिन मैंने मिस्सी दीदी से पूछा, " मिस्सी दीदी आप शादी क्यों नही कर लेती ?"

यह प्रशन सुन कर मिस्सी दीदी गंभीर हो जाती जैसे किसी और ही दुनिया में चली जाती। काफी देर तक जब मिस्सी दीदी ज्यों ही बुत्त बनी रहती तो में अनायामन्सक हो उठा और पूछा, " क्या सोच रही हो मिस्सी दीदी?"

" आँ......कुछ नही रे, तूं बात कर न? हाँ क्या कह रहा था तूं?"

पर मैं यही कहता, " नही आप बतायो क्या सोच रही थी?"

क्योंकि मैं तब छोटा था सो मिस्सी दीदी के मन की व्यथा को समझ नही पता था उस की भावनाओ से दूर अपने बच्चों जैसी बातें ही मन में सोचता था। मैं चाहता था के मिस्सी दीदी की हर भावना, स्वपन, चिंता, भविष्य आदि चीजों के साथ मैं ख़ुद को भी जोड़ पाऊँ।

फ़िर एक दिन एक भयंकर सा दौरा मिस्सी दीदी को पड़ा। इस बार उन्हें पास के शहर के बड़े हस्पताल में दाखिल होना पड़ा। मैं दीद की हालत जाने को व्याकुल था पर मुझे वहां कौन ले जाए। एक दिन पापा उन का हाल पूछने जाने वाले थे मैंने भी उन से जिद की तो वोह मुझे साथ ले जाने को मान गए।

हस्पताल में जैसे दुनिया भर के लोग इकठ्ठे हुए पड़े ।
वो रात मैं आज तक नहीं भूल सका और शायद मरते दम तक नहीं भूलूंगा बिमारी कोई साधारण नहीं थी थोड़ी थोड़ी देर बाद नर्से और डाक्टर चक्कर लगाते रहें। पता नहीं क्यों मुझे दीदी के चेहरे से डर सा लग रहा था मिस्सी दीदी की नज़रें कही खाली स्थान पर टिकी हुई लगती थी यहाँ वो लगातार निहारे जा रही थी उन का चेहरा उस समय किसी दिव्यामान देवी की मानिंद लग रहा था। वहाँ पर उन की सेवा करने वाला कोई नहीं था। मैंने कई बार बाहर से दीदी को पानी ला कर पिलाया। डाक्टर ने एक बार उन से मेरे बारे में पूछा भी तो उन्होंने कहा " यह मेरा छोटा भाई है। " डाक्टर उस के यूरोपियन चेहरे और मेरे हिन्दुस्तानी नाक नक़्शे का हैरानी से मुयाना करता चला गया दीदी इस समय धीरज और सिथ्रता की मूर्ती बने बेठी थी। डाक्टर आते थे, चले जाते थे। कोई दवा दे जाता तो कोई इंजेक्सन लगा जाता। दवाइयों की गंध, पेंसिलिन, बर्फ आदि का बिखराव था चारो ओर।

मुझे याद है की घर से आता हुआ मैं मन ही मन शिव शंकर भगवान् का स्मरण करके आया था ओर मन ही मन मैंने मिस्सी दीदी के ठीक होने की मन्नत भी मांगी थी। मुझे ऐसे लग रहा था मानो मैं मिस्सी दीदी को पहली बार देख रहा था। वो सिर्फ़ यूरोपियन या नहीं बल्कि उस के ऊपर एक नारी थी। ड्राइंग रूम का व्यक्तित्व तो व्यक्ति का असली रूप नही हो सकता। मनुष्य की पहचान करना क्या इतना सरल होता है। मैले कपड़ों से या गोरे अथवा काले रंग से तो किसी की पहचान नहीं की जा सकती। भले ही मिस्सी दीदी यूरोपियन थी पर थी तो वो भी आख़िर एक इंसान, उस के सीने में भी एक ममता भरा दिल था।

वो उस रात बहुत रोंती रही, मैंने अपने हिसाब से उन्हें चुप कराने की बड़ी कोशिश भी की जब की ख़ुद मुझे उन की हालत देख कर रोना आए जा रहा था उन्होंने मुझे चुप करते हुए कहा "तूं तो मेरा छोटा भईया है, मत रो। अगर तूं सच मैं अपने को मेरा भइया मानता है ना तो कहीं से मुझे एक कप चाय पिला दे यह डाक्टर तो मुझे पीने ही नही देते " मुझे यह सुनना ही था के मैं हस्पताल के बाहर दुकानों पर चाय लेने के लिए चला गया।

हाथ में मैं चाय लिए भागा भागा वार्ड नुम्बर में गया तो देखा उन के बिस्तर को चारो ओर से डाक्टर और दो नर्स घेरे हुए थे। मैंने देखा एक नर्स ने उन के चेहरे तक कपड़ा ओडा दिया। मेरे हाथों से चाय का ग्लास वोही पर गिर गया। मईसमझ चुका था दीदी हममे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी थी। शोकाकुल मेरी वाणी मूक हो गयी थी, आँखों का पानी जैसे सूख गया था। मैं रोना चाह कर भी रो नही पा रहा था। उस दिन पहली बार जाना की दुनिया में किसी का शोक सुनने का किसी के पास समय नही होता है। दुनिया का दस्तूर तो यही रहा है जो गया उसे जाने दो, जो बचा है उस की बात करो। जो गया सो तो गया पर तुम तो मोजूद हो न।

डाक्टर व् नर्से ग्लास टूटने की आवाज़ से चोंके। उन में से एक नर्स ने बढ़ कर मेरी ऊँगली पकड़ ली और मुझे दूसरे कमरे के पास ड्यूटी रूम में ले गयी। मुझ से पूछा मैं कौन हूँ और मेरा पेसंट से क्या रिश्ता है? मैंने उसे सभ बताया और घर का पता भी दिया। उस ने हमारे पड़ोसी के यहाँ फ़ोन पर बुला कर अपप से बात की और मुझे थपथपाया , लेकिन मैं शोकाकुल मौन सा बैठा रहा। मुझे यह सब एक सपने सा लग रहा था जिस से मैं कभी भी जाग जाऊँगा।

शाम को पापा आए, मुझे ले कर बहुत चिंतित थे। उन्हें देख कर मेरे आंसू निकल पड़े, और मुझे पता नही मैं कब तक उन की गोद में अपना सर रखे रोता रहा। पापा मुझे घर छोड़ आए और ख़ुद मिस्सी दीदी की शव यात्रा मैं शामिल होने भी गए। मैं घर पर बेसुध सा हो कर लेता रहा। दूसरे दिन से मुझे बेहद बुखार रहा। चार पाँच रोज़ के बाद मुझे कुछ सुध आयी।

बीजी ने मुझे बाद में बताया मैं बेहोशी की हालत में यही कह रहा था बार बार " चाय वाली दीदी तुम कहाँ हो?"

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