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Friday, December 11, 2009

आँखें क्या कहती है?

पहली ही नज़र में प्यार हो जाने की बात तो अक्सर आप ने सुनी ही होगी क्योंकि यह एक मानी हुई सहज और स्वभाविक सी बात है। किसी की आँखों में प्यार देखना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और अध्याम्तिक घटना है जिस की पूरण व्याख्या कोई नहीं कर सका है। आँखे तो एक तरह से आत्मा की खिड़कियाँ होती है जिन के रास्ते कोई भी झाँक कर दुसरे के मन की भावनाओं को पढ़ सकता है। सच्चे मन से मर्म को सपर्श करने वाली निगाहों से देखने वाली आँखों की मन पर सीधी प्रतिक्रिया सी होती है जिसे शारीरक स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। यह भी एक ज़ाहिर सी बात है की आँखों की प्रतिक्रिया से पेट का संतुलन भी बिगड़ जाता है, जैसे घुमावदार सड़क पर यात्रा करते समय मितली का आना, अगर आँखें सिर्फ सीधी सड़क पर ही रहें तो कभी मितली भी नहीं आती। इसलिए आँख द्वारा देखे गए किसी द्रश्य का प्रभाव मानव शरीर पर भी पड़ता है। यहाँ तक की रंग भी हमारी मनोस्थिति को प्रभावित कर सकते है और ऐसी भावात्मक प्रतिक्रियों को जनम देते है जिसे शरीर भी महसूस कर सकता है। आप कहोगे वो कैसे। तो देखिये अगर आप हरे रंग को देखेंगे जो हल्का पीलापन लिए हो तो मन में एक freshness का अहसास पैदा हो जाता है लाल रंग वास्तविक में हार्दिकता या गर्मजोशी की भावना पैदा कर सकता है। हरा रंग एक ठंडापन, गहरा नीला रंग अपशकुन, हल्का नीला रंग मनोरमता की भावना, बैंगनी रंग विषाद व् उदासी की भावना तथा हल्का पीला रंग आनंद और चमकती धूप जैसे ख़ुशी और प्रसन्नता की भावना पैदा कर सकता है

कभी कभी हम यह भी देखते है की प्रतिक्रिया या Reaction अनुकूल दिशा में भी काम कर सकते है और हमारे मनोभाव, हमारी द्रिष्टि को प्रभावित कर सकते है। हम वही देखते है जो देखना चाहते है या फिर जिसे हम देखना नहीं चाहते उसे नजरअन्दाज ही कर देते है। जैसे अगर हमारा मन उदास हो तो हमारी द्रिष्टि सिर्फ उदासीन करने वाली वस्तुयों को ही देखती है प्रसन्नता भरे नज़ारे नज़र अंदाज़ हो जाते है। हमारी सभी छह इन्द्रियों में से द्रिष्टि की इन्द्री सब से महतवपूर्ण है, हमारी सभी ज्ञानिन्द्रियों में से निसंदेह यह सर्वाधिक सवेंदनशील है तभी तो खतरे के वक़्त आँखें फ़ौरन बंद हो जाती है और शरीर के सम्पूरण अंग अपने आप हरकत में जाते है


किसी व्यक्ति की आखों को देख कर पता चल जाता है कि वो किसी चीज़ को देख रहा है, आप ख़ुद भी किसी को खतरे का संकेत करने के लिए आंखों से इशारे का काम लेते है। हमारी नज़र से ही हमारी अपराध-भावना, गर्व- भावना, या अन्य मानवीय भावनाओं का संकेत मिल जाता है। आँखें आनंद और प्रसन्नता तथा दुःख और व्यथा प्रगट करती है। इनके आंसू, दुःख - दर्द, व्यथा और दिल टूटने या फ़िर खुशी और आनंद के प्रतीक हो सकते है। इतना ही नही, हम तो तब तक हँसते रह सकते है जब तक हमारी आंखों से आंसू टपकने लगे।

एक बात बहुत महत्वपूर्ण है वो यह कि जब भी हम पहली बार किसी व्यक्ति से मिलते है तो हमारा पूरा ध्यान दूसरे व्यक्ति की आंखों पर ही होता है क्योंकि आँखें चरित्र का सारा भेद खोल देती हैं। हम चाहे कितने ही मुखोटे लगा ले, कितना ही प्यार प्रदर्शित करे, लेकिन हमारी आँखें हमारी वास्तविक प्रकृति, स्वभाव रवैये को उजागर कर देती है। होठों पर मुस्कान ला कर मित्रता का नाटक तो किया जा सकता है लेकिन आंखों से वास्तविकता प्रगट हो जाती है। अगर वो मुस्करा नही रही हो तो भेद खुल जाता है की उन में मित्रता की चमक है या नही।

आँखें मन के आंतरिक भावों की सब से बड़ी भेदिया है। अक्सर फिल्मों में हीरो हिरोइन से कहते तो सुना होगा की " मेरी आंखों में झांक कर देखो क्या मै ने तुम्हे धोखा दिया है?" चंचल आखों वाले व्यक्ति को तो तुरंत ही अविश्वनीय मान लेना चाहिए। ऐसा व्यक्ति या तो आप से आँखें मिला ही नही पायेगा अथवा उसकी आँखें इधर उधर कुछ इस ढंग से घूमती रहेंगी जैसे छुपने की जगह तलाश कर रही हो।

आँखें सहायता मांगने का संदेश भी भेज सकती है। वे अनुनय भरी निगाहों से देख सकती है, उन की दृष्टि में एक अनुरोध हो सकता है या फ़िर एक ठंडेपन के साथ हमारी नज़रों का वो प्रतिरोध कर सकती हैं, या फ़िर वे पूरी सत्रकता से शंकालु हो उठती है या किसी शंका से सिकुड़ सकती है। कुछ आँखें हम पर उचटती सी निगाह डाल कर पूर्ण तटस्थ और उदासीनता का संकेत दे सकती है। ऐसी आंख्ने भी हो सकती है जो कोई उत्तर पाने के लिए व्यग्र हो, ऐसी आँखें भी हो सकती है जो जिनमे इच्छा, आशा, अभिलाषा और लालसा की चमक हो, या उदासी, प्रान्हीनता, निराशा और दुःख का गहरा अन्धकार हो। आँखें हमारी जुबान के बाद समूचे शरीर का सब से अधिक बोलने वाला अंग है और हमारे मन के सच्चे भावों को वास्तविक रूप में व्यक्त करने के लिए जुबान से भी अधिक विशावाश्नीय है। यहाँ जुबान एक बात कह सकती है वह आँखें कुछ और भी कह सकती है। जुबान तो मिश्री की तरह से मीठी हो सकती है पर आंखों से टपकती घृणा वास्तवकिता प्रगट कर देती है। यह भी हो सकता है की शब्दों में तो गुस्से को वाणी मिल रही हो लेकिन आँखें प्रेम में खाई हुई चोट की खानी कह रही हो। सो आँखें हमारे सभी भावों को स्रवाधिक सच्ची निष्कपट संदेश वाहक यानी Communicator है। बेशक हम चाहे या ना चाहें पर यह मन की गहराईयों में छुपे भावों को उजागर कर देती हो। हमारी जुबान झूठ बोल देती है पर आँखें उस के सम्बन्ध में प्राय सच ही बोलती है सो झूठ पकड़ा जाता है।

आँखें ही वोह अंग है जिन के द्वारा hypnotism सम्भव है। इनमे इतनी शक्ति है की किसी भी व्यक्ति को आज्ञा का पालन करने पर मजबूर किया जा सकता है। आंखों के माधय्म से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की इच्छाओं, अभिलाषायों, गतिविधियों और आत्मा को ना केवल प्रभाभित ही कर सकता है बल्कि कंट्रोल भी कर सकता है।

5 comments:

परमजीत बाली said...

अच्छा विश्लेष्ण किया है।सच मे आँखे बहुत कुछ कह जाती हैं।अच्छी ज्ञानवर्धक पोस्ट है।आभार।

अनिल कान्त : said...

आपने एक बहुत अच्छा और ज्ञांवर्धक लेख लिखा है.
मेहनत साफ दिखाई दे रही है

अर्कजेश said...

अच्‍छा लेख । थोडा बडा हो गया है ।

ऑख वह खिडकी है जिसके द्वारा एक व्‍यक्ति दूसरे में झांक सकता है ।

आशु said...

परमजीत जी, अनिल जी व् अर्क्जेश जी,

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद. मेरा यह पहला प्रयास है कुछ अलग से लिखने का।
आप के सुझाव मेरी लेखनी को सुधारने में मेरी बहुत मदद करते है।

अपने सुझाव देते रहे।

आशु

creativekona said...

आशु जी,
बहुत अच्छा प्रभावशाली लेख है। आपकी भाषा में प्रवाह है---शब्दों में लयात्मकता है---और लेख का कथ्य भी रोचक है---उम्मीद है आगे और विषयों पर भी आपके लेख आयेंगे।शुभकामनायें।
हेमन्त कुमार

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