Google+ Followers

Google+ Followers

Tuesday, March 1, 2016

यादें


घर जाता हूँ, लगता है बचपन पास आ रहा है !!
भूली यादों का तूफ़ान सा दिल में समा रहा है !!

रेल की खिड़की पर बैठ सदा महसूस हुआ है;
जो जितना क़रीब था वो उतना दूर जा रहा है !!

माँ, बहिन, भाई, बचपन के खेले हुए साथी,
बन कर चलचित्र सा मेरे ज़ेहन पर छा रहा है !!

क्या हो गया हमें, किस दौर से गुज़र रहे हैं?
अपने से गुमशुदा हो, दिल कहाँ जा रहा है !!

बेतरतीब रफ़्तार ख़यालों की कम नहीं होती,
यादों का यह काफिला बस गुज़रता जा रहा है !!

अपनों से बिछड़े पल, सालों में बदल गए है,
वक़्त का गुबार यादों पे बिखरा जा रहा है !!

हंसने को तो यह मन करता हैं बहुत "आशु"
बस यादों का सिलसिला मुझ को रुला रहा हैं !!

4 comments:

Digamber Naswa said...

गुज़रती उम्र में ऐसे ख्याल मन को अक्सर तड़पाते हैं ... अपनों की यादें साथ नहीं छोड़ती ...
लाजवाब भावपूर्ण ग़ज़ल ...

जमशेद आज़मी said...

बहुत ही सुंदर रचना। बेहद मार्मिक भावों से युक्त पोस्ट की प्रस्तुति। मेरे ब्लाग पर आपका स्वागत है।

Rajesh kumar Rai said...

यादों के पन्ने पलटती रचना। बहुत खूब।

Rajesh kumar Rai said...

यादों के पन्ने पलटती रचना। बहुत खूब।

Copyright !

Enjoy these poems.......... COPYRIGHT © 2008. The blog author holds the copyright over all the blog posts, in this blog. Republishing in ROMAN or translating my works without permission is not permitted.