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Tuesday, December 8, 2009

कितना मुश्किल लगता है..

बीती बातों को भूल के जीना कितना मुश्किल लगता है,
भंवर के बीच रखना सफीना कितना मुश्किल लगता है॥

नादाँ दिल भूले भी तो कैसे अपनी बीती यादों को,
दिल के पन्नों से नाम का मिटना कितना मुश्किल लगता है॥

ग़मज़दा हो दिल तो कैसे खुशीयों को महसूस करे,
अपनी ही तनहाइयों से उभरना कितना मुश्किल लगता है॥

तेरी आँखे, तेरा चेहरा रहता है सदा ख्यालों में,
तेरे वजूद से दूर हो रहना कितना मुश्किल लगता है

बीत चुकी है जैसे अब तक बाकी भी गुज़र जाएगी,
रोते रोते फ़िर भी हँसना कितना मुश्किल लगता है॥

उनकी ज़फा से हमने तो घर जला कर रख दिया,
अपनी वफ़ा से जिंदा रहना कितना मुश्किल लगता है॥

आशु क्या करें शिकवा मुहब्बत की रुसवाइयों का,
सब को जग में प्यार का मिलना कितना मुश्किल लगता है॥

2 comments:

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

bahut sundar abhivyakti .
हिन्दीकुंज

हरकीरत ' हीर' said...

बीती बातों को भूल के जीना कितना मुश्किल लगता है,
भंवर के बीच रखना सफीना कितना मुश्किल लगता है॥
वाह........;!!

नादाँ दिल भूले भी तो कैसे अपनी बीती यादों को,
दिल के पन्नों से नाम का मिटना कितना मुश्किल लगता है॥

बहुत खूब .....आशु जी बढिया लिखते हैं आप ....!!

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