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Wednesday, December 2, 2009

चाय वाली दीदी - अन्तिम भाग

" इस कहानी को देरी से पूरी करने के लिए मैं अपने प्रिय पाठको से क्षमाप्रार्थी हूँ। इसे लिखने के लिए मुझे अपने अन्दर से बहुत कुछ खोजना पड़ा और बड़ी तकलीफ भी हुई इसे पूरा करने में इसे लिखते वक़त मुझे कुछ ऐसे हालातों का सामना करना पड़ा जिन के बारे में सोचा नही था। पेश हैं अन्तिम कड़ी, उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी"
- आशु



जब
भी मैं स्कूल से लोटता तो चाय मैं मिस्सी दीदी के यहाँ ही पीता थावोह मुझे बिना दूध वाली चाय नहीं देती थी जब मिस्सी दीदी बिना दूध वाली चाय पीती थी तो पता नहीं क्यों मेरा मन उदास हो जाता था मैंने कई बार उन्हें मना भी किया पर उन से यह आदत छूटती ही थी, वो दिन में कम से कम १०-१२ प्याले चाय पीती थी बीजी ने कई बार मना भी किया मुझे के मैं मिस्सी दीदी के पास जाऊं, और पापा से भी बोला कई बार पापा ने कहा, " अरे बच्चा है क्या हुआ, फिर वोह बेचारी अकेली है अगर वोह दो घडी इस से बात कर लेती है तो क्या फरक पड़ जाता है" जात पात तो पापा पहले से ही नहीं मानते थे हालांकि बीजी काफी सखत थे इस मामले में

लेकिन फिर मैंने जाना आना कम कर दिया क्योंकि लड़के मुझे चिड़ाने लगे थे. मुझे बड़ा गुस्सा भी आता था सो मैं कई कई दिनों बाद सब की नज़रे बचा कर चला जाता था मिस्सी दीदे पूछती, " इतने दिन कहाँ था रे?"

उस के बाद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कुर्सी पर बेठाती फिर चाय पिलाती और केक पास्ट्री भी खाने को देती अब तो जैसे मिस्सी दीदे औरत अधिक हिन्दोस्तानी लगने लगी थी. वोह अक्सर साडी पहनाने लगी थी और फिर साडी के छोर पर कभी कभी चाबियों का गुच्छा बंधा रहता था कभी कभी हाथों पर महावर भी रचती ठी मिस्सी दीदी को महावर रचना मैंने ही शुरू किया था अब जब कभी मिस्सी दीदी को महावर रचाने को कहती तो मैं कह देता, " अब मैं नहीं लगाऊंगा मैं अब बड़ा हो गया हूँ"

"ओह यह बात है! ज़रा मैं भी देखूं कितना बड़ा हो गया है तू " कह कर हँसते हँसते मेरे सामने खडी होती फिर कहती, " ज़रा खड़े हो तो तुम्हे नाप कर देखूं तूं कितना बड़ा हो गया हे रे मुझ से "

फिर मुझे हाथ से नाप कर कहती, " तूं तो अभी तक मेरे कन्धों तक भी नहीं पहुंचा, बड़ा होने चला है "

तभी कुछ दिनों बाद मिस्सी दीदी को अचानक अटैक हो गया वोह बिस्तर पर पड़ गयी. हस्पताल का सारा स्टाफ उसे दिलासा दे कर गया. डाक्टरों ने उसे चाय पीने से भी मना कर दिया मुझे अच्छी तरह से याद है हमारे घर के पिछली तरफ शिव जी भगवान् का मंदिर था मुझे शिव जी भगवान् पर बचपन से ही बड़ी आस्था रही है स्कूल से लोटते समय उस की सीमेंट से बनी बेदी पर माथा टेक कर परनाम करता और कहता था , " हे शिव बाबा भोलेनाथ, अगर आप मुझे अपना साचा भक्त मानते है तो मेरी मिस्सी दीदी को शीघ्र ही ठीक कर दो" फिर कहता था, " हे शिव जी बाबा, मेरी मिस्सी दीदी हिन्दू नहीं है, इस का आप विचार करें क्योंकि मैं तो हिन्दू हूँ और मिस्सी दीदी तो मेरी बहन है. मिस्सी दीदी का यहाँ कोई नहीं सो उसे शांती देना भगवान "

लेकिन जब काफी दिनों से मिस्सी दीदी की तबियत ठीक नहीं हुई तो एक दिन मैंने दीदी के घर लगी जेसुस क्रीस्त की तस्वीर के आगे प्रार्थना की थी, "मिस्सी दीदी को ठीक कर दो ईस्सू। उस का मंगल करना. तुम्हारे देश की लड़की इस देश में मुसीबते झेल रही है प्रभु, उस की रक्षा करो उसे और कोई मुसीबत में मत डालो ।"

फ़िर एक दिन काली माँ के मदिर में पाँच आने का प्रसाद चढ़ा कर मैंने मिस्सी दीदी को प्रसाद ला कर दिया जो मिस्सी दीदी ने बड़ी श्रद्धा से खाया। धीरे धीरे दीदी की तबियत सुधर गयी तो मैंने सब भगवानों का धन्यवाद किया। मिस्सी दीदी के चेहरे पर चिर-परिचत सी मुस्कान फ़िर से लौट आयी।

एक दिन मैंने मिस्सी दीदी से पूछा, " मिस्सी दीदी आप शादी क्यों नही कर लेती ?"

यह प्रशन सुन कर मिस्सी दीदी गंभीर हो जाती जैसे किसी और ही दुनिया में चली जाती। काफी देर तक जब मिस्सी दीदी ज्यों ही बुत्त बनी रहती तो में अनायामन्सक हो उठा और पूछा, " क्या सोच रही हो मिस्सी दीदी?"

" आँ......कुछ नही रे, तूं बात कर न? हाँ क्या कह रहा था तूं?"

पर मैं यही कहता, " नही आप बतायो क्या सोच रही थी?"

क्योंकि मैं तब छोटा था सो मिस्सी दीदी के मन की व्यथा को समझ नही पता था उस की भावनाओ से दूर अपने बच्चों जैसी बातें ही मन में सोचता था। मैं चाहता था के मिस्सी दीदी की हर भावना, स्वपन, चिंता, भविष्य आदि चीजों के साथ मैं ख़ुद को भी जोड़ पाऊँ।

फ़िर एक दिन एक भयंकर सा दौरा मिस्सी दीदी को पड़ा। इस बार उन्हें पास के शहर के बड़े हस्पताल में दाखिल होना पड़ा। मैं दीद की हालत जाने को व्याकुल था पर मुझे वहां कौन ले जाए। एक दिन पापा उन का हाल पूछने जाने वाले थे मैंने भी उन से जिद की तो वोह मुझे साथ ले जाने को मान गए।

हस्पताल में जैसे दुनिया भर के लोग इकठ्ठे हुए पड़े ।
वो रात मैं आज तक नहीं भूल सका और शायद मरते दम तक नहीं भूलूंगा बिमारी कोई साधारण नहीं थी थोड़ी थोड़ी देर बाद नर्से और डाक्टर चक्कर लगाते रहें। पता नहीं क्यों मुझे दीदी के चेहरे से डर सा लग रहा था मिस्सी दीदी की नज़रें कही खाली स्थान पर टिकी हुई लगती थी यहाँ वो लगातार निहारे जा रही थी उन का चेहरा उस समय किसी दिव्यामान देवी की मानिंद लग रहा था। वहाँ पर उन की सेवा करने वाला कोई नहीं था। मैंने कई बार बाहर से दीदी को पानी ला कर पिलाया। डाक्टर ने एक बार उन से मेरे बारे में पूछा भी तो उन्होंने कहा " यह मेरा छोटा भाई है। " डाक्टर उस के यूरोपियन चेहरे और मेरे हिन्दुस्तानी नाक नक़्शे का हैरानी से मुयाना करता चला गया दीदी इस समय धीरज और सिथ्रता की मूर्ती बने बेठी थी। डाक्टर आते थे, चले जाते थे। कोई दवा दे जाता तो कोई इंजेक्सन लगा जाता। दवाइयों की गंध, पेंसिलिन, बर्फ आदि का बिखराव था चारो ओर।

मुझे याद है की घर से आता हुआ मैं मन ही मन शिव शंकर भगवान् का स्मरण करके आया था ओर मन ही मन मैंने मिस्सी दीदी के ठीक होने की मन्नत भी मांगी थी। मुझे ऐसे लग रहा था मानो मैं मिस्सी दीदी को पहली बार देख रहा था। वो सिर्फ़ यूरोपियन या नहीं बल्कि उस के ऊपर एक नारी थी। ड्राइंग रूम का व्यक्तित्व तो व्यक्ति का असली रूप नही हो सकता। मनुष्य की पहचान करना क्या इतना सरल होता है। मैले कपड़ों से या गोरे अथवा काले रंग से तो किसी की पहचान नहीं की जा सकती। भले ही मिस्सी दीदी यूरोपियन थी पर थी तो वो भी आख़िर एक इंसान, उस के सीने में भी एक ममता भरा दिल था।

वो उस रात बहुत रोंती रही, मैंने अपने हिसाब से उन्हें चुप कराने की बड़ी कोशिश भी की जब की ख़ुद मुझे उन की हालत देख कर रोना आए जा रहा था उन्होंने मुझे चुप करते हुए कहा "तूं तो मेरा छोटा भईया है, मत रो। अगर तूं सच मैं अपने को मेरा भइया मानता है ना तो कहीं से मुझे एक कप चाय पिला दे यह डाक्टर तो मुझे पीने ही नही देते " मुझे यह सुनना ही था के मैं हस्पताल के बाहर दुकानों पर चाय लेने के लिए चला गया।

हाथ में मैं चाय लिए भागा भागा वार्ड नुम्बर में गया तो देखा उन के बिस्तर को चारो ओर से डाक्टर और दो नर्स घेरे हुए थे। मैंने देखा एक नर्स ने उन के चेहरे तक कपड़ा ओडा दिया। मेरे हाथों से चाय का ग्लास वोही पर गिर गया। मईसमझ चुका था दीदी हममे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी थी। शोकाकुल मेरी वाणी मूक हो गयी थी, आँखों का पानी जैसे सूख गया था। मैं रोना चाह कर भी रो नही पा रहा था। उस दिन पहली बार जाना की दुनिया में किसी का शोक सुनने का किसी के पास समय नही होता है। दुनिया का दस्तूर तो यही रहा है जो गया उसे जाने दो, जो बचा है उस की बात करो। जो गया सो तो गया पर तुम तो मोजूद हो न।

डाक्टर व् नर्से ग्लास टूटने की आवाज़ से चोंके। उन में से एक नर्स ने बढ़ कर मेरी ऊँगली पकड़ ली और मुझे दूसरे कमरे के पास ड्यूटी रूम में ले गयी। मुझ से पूछा मैं कौन हूँ और मेरा पेसंट से क्या रिश्ता है? मैंने उसे सभ बताया और घर का पता भी दिया। उस ने हमारे पड़ोसी के यहाँ फ़ोन पर बुला कर अपप से बात की और मुझे थपथपाया , लेकिन मैं शोकाकुल मौन सा बैठा रहा। मुझे यह सब एक सपने सा लग रहा था जिस से मैं कभी भी जाग जाऊँगा।

शाम को पापा आए, मुझे ले कर बहुत चिंतित थे। उन्हें देख कर मेरे आंसू निकल पड़े, और मुझे पता नही मैं कब तक उन की गोद में अपना सर रखे रोता रहा। पापा मुझे घर छोड़ आए और ख़ुद मिस्सी दीदी की शव यात्रा मैं शामिल होने भी गए। मैं घर पर बेसुध सा हो कर लेता रहा। दूसरे दिन से मुझे बेहद बुखार रहा। चार पाँच रोज़ के बाद मुझे कुछ सुध आयी।

बीजी ने मुझे बाद में बताया मैं बेहोशी की हालत में यही कह रहा था बार बार " चाय वाली दीदी तुम कहाँ हो?"

1 comment:

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर कहानी है शैली और कथानक कथ्य ने प्रभावित किया शुभकामनायें

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