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Monday, November 9, 2009

पतझड़

भूल नहीं पाता हूँ
पतझड़ मास को मैं
जब तुम से जुदा होता हूँ

ज्यों पत्ते शाख से टूटे
मैं टूटता हूँ तुम से
आशुकन लिए हुए,
हवाओं के झोंको से
उड़ता हुआ तेरा आँचल
रह रह के सदा देता है

बढते कदम यह मेरे
एक बार जकड जाते हैं
मैं रुक के देखता हूँ
तेरा आंशु भरा चेहरा
फ़िर हाँथ उठा कर
अलविदा कह देता हूँ
और चल देता हूँ

धीरे धीरे तेरा चेहरा
कहीं दूर खो जाता है
आंखों में अकस तेरा
आज भी उभर आता है
एक नासूर की तरह
यादों के घांव को
फ़िर से सहला जाता है

लगता हैं
तुम सामने ही तो हो
सब देखती समझती हो
बस
मेरे एहसासों की खामोशी को
खड़ी चुप के से निहार रही हो

2 comments:

creativekona said...

सुन्दर कविता---कहीं कहीं टाइपिंग की गलतियां हैं उन्हें थीक कर लीजियेगा।
शुभकामनायें।
हेमन्त कुमार

आशु said...

हेमंत जी,

आप का बहुत बहुत शुक्रिया. झोंक आ कर लिखी थी और उसे ठीक किये बिना ही पोस्ट कर दिया..अभी थोड़ी ठीक की है गलतिया .

आशु

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