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Wednesday, December 17, 2008

चाय वाली दीदी - भाग ३


पीछे मुड कर देखते ही मेरा समूचा बदन ठंडा पड़ गया। मिस्सी दीदी सामने खडी थी।
वही से फ़िर वोह बोली, " कम इन"
मैंने कहा, " मैं अंग्रेज़ी नही जानता"
लेकिन मिस्सी दीदी मेरा हाथ पकड़ कर सीधे कमरे में ले गयी। स्वय एक कुर्सी पर बैठ गयी और मुझे अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठा लिया। मेज़ पर चाय का क्प पड़ा था जिस में से भांप निकल रही थी, बिल्कुल काली चाय बिना दूध के। मैंने पूछा, " आप दूध क्यों नही डालती हो चाय में?"
"हमे ऐसे ही पीना अच्छा लगता है" इतना कह कर दीदी ने क्प में से बड़ा सा सिप लिया और फ़िर इजी चेयर पर अपनी पीठ टिका दी।

"क्या नाम है तुम्हारा?"
"कुकू "
"कको ? यह भी कोई नाम है क्या? ओ के, तुम हमे मिस्सी दीदी बोलने को मांगता है? ठीक है हम तुम्हारा मिस्सी दीदी है। तुम हमारा भाई होने को मांगता है? छोटा भाई? हमारा कोई भाई नही होता है। चलो हमे मिस्सी दीदी बोलो ना?"
"मिस्सी दीदी"
"ओह थैंक यू। थैंक यू वैरी मच। बहुत अच्छा, हम तुम को चोकलेट देगा खाने को। और तुम मुझे क्या दोगे, ज़रा मैं भी सुनु?
मैं मिस्सी दीदी के बिल्कुल पास बैठा था और उस से आने वाली भीनी भीनी खुसबू बड़ी अच्छी लग रही मुझे। आहा कितनी मीठी सी खुसबू थी और कितनी पवित्रता का एहसास भी कराती थी जैसे। चोकोलेट से भी जयादा मीठी।
"ऐ इस तरह क्यों देख रहा है?"
मुझे बड़ी शर्म सी आयी मैंने नज़रे झुका ली।
मिस्सी दीदी ने फ़िर पूछा, " बोल ना क्या देख रहा था?"
मैंने कहा, " सभी मेंम साहिबाएँ क्या तुम्हारी तरह ही सुंदर होती है मिस्सी दीदी?"
मेरी बात सुन कर मिस्सी दीदी हंसने लगी फ़िर बोली, " तुम ने कितनी मेम साहिबयों को देखा है रे?"
मैंने कहा " एक भी नहीं, सिर्फ़ तुम्हे ही देखा है बस। क्या सभी मेम साहिबाएँ इसी तरह की फ्राक पहनती है क्या?"
मिस्सी दीदी और भी ज़यादा हंसने लगी। "फ्राक पहन क्या मैं ज़यादा सुंदर दीखती हूँ?"
मैंने कहा "हाँ, तुम हमेशा फ्राक ही पहना करो।"
मिस्सी दीदी ने कहा " अरे तुम्हारा लोग बुरा मानता है कको। कहता है इस देश में बड़ा हो कर फ्राक पहनना नहीं मांगता।"
मैंने कहा " मिस्सी दीदी, तुम्हारा माँ और पप्पा नहीं है क्या?"
मिस्सी दीदी यह प्रसन सुन कर गंभीर हो गयी और अचानक उस की आँखें नम सी हो गयी और उस ने टेबल से एक फोटो निकाली और बोली " यह हमारा पप्पा और मम्मा का फोटो होता वो हम को छोड़ कर अब जीसुस् क्राइस्ट के पास चला गया। तब हम बहुत रोया था, हमारा मम्मा पप्पा हम से बहुत बहुत प्यार करता था। उन दोनों का कार एक्सीडेंट हो गया था।"
मैंने पूछा " तुम्हारा क्या कोई भाई भी नहीं है?"
मिस्सी दीदी ने कहा " तो क्या हुआ तूं जो अब मेरा भाई हो गया है।"
मैंने पूछा " मिस्सी दीदी, शैतान लड़के क्या अच्छे होते हैं? मैं जब कोई शैतानी करता हूँ तो माँ मुझे बहुत डांटती है ।"
मिस्सी दीदी ने कहा " अरे शैतान लड़के तो बड़े अच्छे होते हैं, मुझे तुम जैसे शैतान लड़के अच्छे लगते है।" इतना कह कर मुझे दीदी ने अपने पास खींच लिया और मेरे गाल पर एक बड़ा सा चुम्बन दे दिया और फ़िर बोली "अरे, तेरी माँ तो नाराज़ नहीं होगी तेरे यहाँ आने से?"
मैंने कहा " माँ को कैसे मालूम होगा मैं यहाँ आया हूँ?"
दीदी ने कहा "अगर माँ को पता चल गया तो?"
मैंने कहा " माँ को नहीं पता चलने दूँगा दीदी।"

बाकी अगले भाग में....

4 comments:

विवेक सिंह said...

चाय वाली दीदी तो दिखीं नहीं पर ऊपर का चित्र अच्छा रहस्यमय लगा .

Udan Tashtari said...

सही है-आगे इन्तजार है मिस्सी दीदी की कथा का.

creativekona said...

Bhai Ashu ji,
Apkee kavitaon men jitnee hee bhavukta hai ...kahanee bhee utnee hee sentimental likh rahe hain ap.Kahani kee khasiyat uskee pravahmayata men hai..is drishti se apkee kahanee badhiya bunee ja rahee hai.ab kahanee ke agle bhag
ka intjar rahega.
Hemant Kumar

ravi said...

nice story man!!!
i am waiting for the next part....

Copyright !

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