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Friday, May 2, 2008

यह मुहब्बत



मुहब्बत को जीतना चाहिए अक्सर यह हार जाती है
इस अहसास के चमन में कभी कभी ही बहार आती है

कभी खुशियाँ यह लाती है अक्सर ग़मगीन करती है
कभी ही चैन लाती है पर अक्सर सकूं छीन लेती है

कभी यह फूल जैसी है कभी यह धूल जैसी है
कभी सपना सा लगती है कभी यह भूल जैसी है

जब यह मुहँ मोड़ लेती है तो दिल बस टूट जाता है
इंसान जीदां तो रहता है मगर सब कुछ छूट जाता है

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