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Thursday, May 8, 2008

मुलाकातें


पुरानी मुलाकातें
तुम्हारी
और मेरी बातें!
आज याद आती है
सुल्गाती है सीने में
बेशुमार
यादों के चीराग!

तुम कैसे चली गयी
बीन सोचे बीन जाने
दे कर हमें दील के दाग़

दील की कीसी मासूम कोने से
एक हूक सी नीकलती है
चाहूँ भी तो नहीं मेटा सकता
मेरा तुम से यह अनुराग

तुम आती थी संघ ले कर
खुशबू का एक झोंका
तेरे जाने के बाद भी
तेरे होने का रहता था धोका

आज
याद करता हूँ उन मुलाकातों को
तुम्हारे संघ की हुई
सभ प्यार भरी बातों को
हमारे तुम्हारे मीलन के
लम्हों की मीठी मीठी
सौगातों को!

हैरान हो कर
सोचता हूँ
यह कैसा है प्यार
जीस मे एक
चला जाता है छोड़ कर
और दूसरा
करता रहता है इंतज़ार!

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